"ककसाड़" आखिर है क्या,,,

ककसाड़ का अर्थ:”-ककसाड़ “( जत्रा या पूजा यात्रा) शब्द व्यापक अर्थ में जनजातियों के द्वारा की जाने वाली लोक देवी और लोक देवताओं की आराधना है जो नृत्य प्रधान पर्व के रूप में मनाया जाता है । बस्तर में एक निश्चित परिधि में निवास करने वाले अबूझमाड़ इलाके का यह एक गोत्र पर्व है जहां गोंड जनजाति के युवक- युवती ,अबाल- वृद्ध सभी एक नियत गांव में जुटते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। इसमें युवक-युवतियों की प्रमुख भूमिका होती है।गायता,सिरसा,  गुनिया एवं गांव के पुजारी इस पूजा को संपन्न कराते हैं। मांदर, ढोल, नगाड़ा, तुड़मुड़ी, मोहरी आदि लोक वाद्य यंत्रों की संगत में नृत्य की प्रस्तुति प्रारंभ होती है। ककसाड़ पर्व मनाने की कोई खास तिथि निश्चित नहीं रहती अलग-अलग गांव का ककसाड़ अलग-अलग समय में मनाया जाता है । ककसाड़ पर्व के साथ ही आदिवासी कबीलों में शादी विवाह की विधिवत शुरुआत होती है।

पत्रिका संकल्पना : 2014-15

आवृत्ति :-  मासिक प्रकाशन,

ककसाड़ मासिक पत्रिका हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं में अपना अलग स्थान बनाती हुई  सिर्फ पत्रिका नहीं वरन् देश के समृद्ध आदिवासी जीवन, संस्कृति, संस्कार का प्रामाणिक दस्तावेज है।

ककसाड़ पत्रिका (जनजातीय चेतना कला संस्कृति एवं समाचार का मासिक) का प्रकाशन अक्टूबर 2015 से नियमित जारी है।

 

 ककसाड़ पत्रिका– जनजातीय चेतना, खासकर विलुप्त होती भाषा, परंपरा  आदि के सांस्कृतिक रूपों -प्रारूपों  को स्थान देकर उसे बढ़ावा देती है। इसमें साहित्यकारों और कलाकारों के साथ लिए गए   साक्षात्कार शोधकर्ताओं के लिए संदर्भ की तरह होते हैं।

 

 उपलब्धियां– 

  1.  फरवरी 2019 को इसे ‘ दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड, सांस्कृतिक मंत्रालय, भारत सरकार” द्वारा श्रेष्ठ पत्रिकाओं की श्रेणी में पुरस्कृत ।
  2. वर्ष 2018 में देश जनजातीय सरोकारों की देश की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका का अवार्ड  “संपदा अवार्ड-2018” से पुरस्कृत
  3. वर्ष 2018 मैं देश समरसता तथा सद्भावना की स्थापना के लिए दिए जाने वाला प्रतिष्ठित  ‘सद्भावना -अवार्ड 2018’ से सम्मानित

 

 इसके आवरण चित्र जिसे हमारे महत्वपूर्ण पाठकों की अपार सराहना मिली है वह मूलरूप से देश की विभिन्न जनजातीय समुदायों के  जनजातीय कलाकारों के द्वारा बनाए जाते हैं , यह जनजातीय कला की विभिन्न विधाओं पर आधारित होते हैं।  ककसाड़ के सालाना  कार्यक्रम में जनजातीय समुदाय के बहुविध उत्थान से जुड़े हुए समाजसेवी ,कलाकार, साहित्यकार,  शिक्षाविद आदि विभिन्न सामाजिक  श्रेणियों में 25 चुनिंदा विभूतियों को विशेष रूप से सम्मानित किया जाता है। इन विभूतियों के निष्पक्ष चयन हेतु 11 सदस्य विद्वानों की चयन समिति गठित की जाती है।